शुक्रवार 21 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में
शुक्रवार 21 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में विद्या सिदार की याचिका पर 12-32 फ़ार्मूला जारी रखने का निर्देश या आरक्षण पर पूरी रोक की अंतरिम राहत पाने की कोशिशें जारी हैं| तकनीकी शिक्षा (मेडीकल, इंजीनियरिंग आदि) की लगभग 16 हजार सीटों पर प्रवेश विवादित हो गया है, छग आरक्षण पर हाई कोर्ट के 19 सितंबर के फ़ैसले से| आदिवासी युवाओं का कुछ हजार सीट का नुकसान हमेशा के लिए हो जाएगा क्योंकि ऐसे प्रकरणों में सीटें खाली कराने से सुप्रीम कोर्ट कतराता है, और बीते समय का नुकसान तो खैर कोई पूरा नहीं कर सकता| शुक्रवार के बाद लगभग दो सप्ताह तक सुप्रीम कोर्ट में किसी नए मामले पर त्वरित सुनवाई की संभावना काफ़ी कम है| आदिवासी समाज के जनप्रतिनिधि और शासकीय अधिकारी/सेवक (किसी सीमा तक चंदा जमा करने के बावजूद) प्रामाणिक विधिक जानकार को आर्थिक सहयोग करने से कतरा रहे हैं| यह दुख और शर्म की बात है कि छग शासन जिसे याचिकाकर्ता के तौर पर सुप्रीम कोर्ट जा कर आदिवासी हित में प्रयास करना चाहिए था उसे जवाब देने के लिए घसीट कर लाना पड़ रहा है|
पूर्व वित्त मंत्री स्व. रामचंद्र सिंहदेव ने पच्चीस साल पहले एक होनहार युवा को “सरगुजा की उम्मीद” कहा था जो अब फ़िर से साबित हुआ है, वैसे दंतेवाडा शहर के लोग उसको अपना आदमी बताते हैं| उस कानूनी सलाहकार के निर्देशन में ही सोमवार 17 अक्टूबर को प्रकाश ठाकुर-योगेश ठाकुर की एस.एल.पी. याचिका के आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट से घासीदास अकादमी और छग शासन के विरुद्ध नोटिस कराया गया है| अब भी आदिवासी जनप्रतिनिधि खुल कर आदिवासी समाज हित के असली लड़ाका का साथ देने से कतरा रहे हैं| प्रभावी हल खोजने के बजाए तमिलनाडु मॉडल, क्वांटीफ़िएअबल डाटा, अनमना अध्यादेश और नवीं अनुसूची की बेमानी चर्चा चल रही है| जिन्होने कभी जिंदगी में सुप्रीम कोर्ट के लिए एक अंग्रेजी पिटीशन नहीं लिखी ऐसे लोगों को आर्थिक सहारा देकर असली संघर्ष को कमजोर किया जा रहा है| जिन लोगों को पांचवीं अनुसूची और आरक्षण के सैद्धांतिक पहलुओं की कोई अकादमिक स्टडी ही नहीं है उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है कि वे सुप्रीम कोर्ट या शासन के समन्वय से वर्तमान संकट का कोई हल निकालेंगे|
अगर आप आदिवासी युवाओं के भविष्य को लेकर असल में चिंतित हैं तो इस संकट को लाने-गहराने वालों से सवाल कीजिए| शंकरलाल उईके, भारत सिंह, बीपीएस नेताम, आर.बी. सिंह, हीरालाल नायक, आर. एस. नायक, किशन मानकर, सदे सिंह कोमरे, मोहनलाल कोमरे, एम. आर. ध्रुव, आर. एन. ध्रुव, शिशुपाल शोरी, बिक्रम लकड़ा, आनंद टोप्पो, फणीन्द्र भोई...अब बोलो| क्या तुम किसी भी तरह काऊंसिलिंग के आखिरी दिन 21 अक्टूबर को आदिवासी युवाओं को कोई राहत दिला सकते हो? अगर हां, तो कर के दिखाओ; और अगर नहीं, तो फ़िर उपाय कर सकने में जो सक्षम है उसको किस हक से बाधित कर रहे हो???
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें