हमारे आदिवासी समाज के लोगों को आज एक कठोर व उचित कदम उठाने की जरूरत है।

हाल ही में मैकल पर्वत श्रेणी(🌳🌳🌳) की पावन भुमि - कवर्धा, में हम आदिवासियों के इष्ट देव भोरमदेव जोहारनी का अवसर प्राप्त हुआ, मेरा वहां जाना प्रथम बार हुआ है।और मैंने वहां पहुंचते ही बहोत से चीजों पर अंदाजा लगाया,वहां हमारे आदिवासी समाज के बहोत से सीधे-साधे भोले-भोले आदिवासी बैगा परिवार के लोग हज़ारों वर्षों से निवासरत हैं, वास्तव में सबसे बड़ा तथ्य यह है कि, "बैगा आदिवासियों"को हमारे छत्तीसगढ़ में गायता,भुमका,(पुजारी) भी कहां जाता है,जो हमारे छत्तीसगढ़ के देवी-देवताओं , के मुख्य पुजारी हैं,इन पुजारीयों के सीधेपन व भोलेपन का फायदा उठाकर, बाहरी पुजारी लोग वहां कब्जा किए हुए बैठे हैं। सर्वप्रथम जैसे ही मैंने मंदिर के अंदर प्रवेश किया,तभी मुझे वहां पर बैठे बाहरी पुजारी- (ब्राम्हण) के ऊपर मैंने गौर किया वह ब्राम्हण (पुजारी)हमारे इष्ट देव "बुढ़ादेव" की प्रतिमा पर तकिया लगाकर सो रहे थे,यह हम आदिवासियों के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप है,जो हमारे इष्ट देव भोरमदेव मंदिर में हमारे पुरखापेन" बुढ़ादेव की "प्रतिमा पर इस तरह के अनाकृत्य हरकत कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि,आज जो बैगा आदिवासी वहां के मुख्य पुजारी होते थे। जो वहां के जल जंगल जमीन व प्रकृति की सौंदर्यता को वर्षों से बनाएं रखें हैं। परन्तु वहां आज सिर्फ और सिर्फ हमारे बैगा आदिवासी की माताएं एवं बहनें झाडु लगाने के लिए काम आते हैं। हमारे आदिवासी समाज के लोगों को आज एक कठोर व उचित कदम उठाने की जरूरत है। नहीं तो ये लोग हमारे अस्तित्व को इसी तरह मिटाते रहेंगे,और अंत में हम मिटने को मजबुर हो जायेंगे। 
जय गोंंडवाना जय जोहार

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