आज 3 जनवरी जयपाल सिंह मुंडा का जन्म दिन है उनका वास्तविक नाम "ईश्वर जयपाल सिंह मुंडा था"

आज 3 जनवरी जयपाल सिंह मुंडा का जन्म दिन है उनका वास्तविक नाम "ईश्वर जयपाल सिंह मुंडा था"
जो एक कन्वर्टेड ईसाई धार्मिक अल्पसंख्यक थे! 
उनका जन्म दिवस जरूर मनाएंगे उसके पहले हमें जयपाल मुंडा की जिवनी पर हमें प्रकाश डालने की कोशिश भी अवश्य करना चाहेंगे ! 

सन 1900  में भगवान बिरसा मुंडा की मौत के बाद अंग्रेजों ने जिसे पाल पोस कर बड़ा किया उस पादरी को भारत में अनुकूल स्थिति तैयार करते हुए इंग्लैंड से बुला कर आदिवासी समुदाय का नेतृत्व जयपाल सिंह मुंडा जी को सौपना एक बड़ी साजिश के तहत अंग्रेजों का षडयंत्र था जो क्रिश्चियन धर्म को अपना लिया था उस जयपाल मुंडा की पुरी स्कूली शिक्षा मिशनरी संस्थान में हुई हो ऐसे धर्मांतरित जयपाल मुंडा  इंग्लैंड से बुला कर भारत के आदिवासी समुदाय के सभी संवैधानिक अधिकारों का नेतृत्व करने वाले शख्स के रूप में अंग्रेजों ने बड़ी चतुराई के साथ नियोजित षड्यंत्र के साथ स्थापित किया ! 

सबसे बड़ा कारण यह था कि भारत कि आजादी के सबसे बड़े क्रांतिकारी बदलाव बिरसा मुंडा के उलगुलान "रानी तुम अपने देश जाओं " हमें हमारी पुरी स्वतंत्रता चाहिए " ऐसे आक्रोशित नारों से ऐसे विरोध करने के प्रयासों से अंग्रेजों को बड़ा भय लगने लगा था!

आगे कि स्थिति क्या रहीयह भी हम भलीभांति जानते हैं कि कैसे भगवान बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर जेल में बंदी बना कर उनके रोज के खाने में धीमा जहर मिला कर धीरे-धीरे देकर मौत के घाट कैसे उतार दिया!

सन 1900 में भगवान बिरसा मुंडा को जीस षड्यंत्र के साथ मौत के घाट उतारा हयह सब देख आदिवासी समुदाय का भारत में अंग्रेजी हुकुमत का घोर विरोधी व उग्र प्रदर्शन करने वाला एक विशेष समुदाय का प्रतीक बन गया था !

इस घौर विरोधाभास के चलते अंग्रेजों को यह एहसास हो गया था कि अब उनका भारत में टिकना मुश्किल है!

अंग्रेज बड़े चतुर थे यह भी हम भलीभांति जानते हैं उन्होंने लम्बे समय तक भारत में सत्ता हमारे हाथों में रहे चाहे हम भारत से चले जाये लेकिन यहा के किसी एक विरोधी जातियों व समुदायों में हमारी नियोजित षड्यंत्रों की प्रवाह जब तक बहती रहेगी हमें भारत को दोबारा से गुलाम बनाने में आसानी होगी !

उन्हें पता था कि प्राचीन काल से भारत आस्थाओं वाला देश है यहां के लोग अपनी रुढ़िवादी परम्पराओं तथा रिती रिवाजों संस्कृतियों पालन बड़ी गंभीरता से करते हैं यहां किसी के द्वारा दिये गये विचारों को 

सर्वमान्यता कैसे दी जाती है! कैसे किसी व्यक्ति के कार्यो को यहां के समुदाय के लोग अपने जीवन में कितनी गंभीरता से लेते है!

भारत में कैसे महापुरुषों को भगवान जैसी प्रतिमा के रूप में कैसे पुजा जाता है!

भारत के ऐसे कई विषयों तथा यहां की गुरु परम्पराओं तथा आध्यात्मिकता का अंग्रेजों को बड़ा गहन अध्ययन था!

अंग्रेज जानते थे कि आदिवासी समुदाय मुंडा के अतिरिक्त किसी अन्य जाति (सरनेम) वाले व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि नही मानने वाले हैं! 

यही जान कर उन्होंने लम्बे समय तक इस पर अध्ययन किया और अपने मनचाहे एक मुंडा परिवार को धर्मांतरित कर संरक्षित किया तथा उनके किसी एक सदस्य को उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड में नितिगत षड्यंत्र समझने के लिए उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा तथा वहां पादरी कि ट्रेनिंग दी गई!

!! और वह व्यक्ति का था जयपाल मुंडा !! 

अंग्रेजों ने समय आने पर भारत में जयपाल मुंडा को बड़ी चतुराई के साथ नियुक्त भी किया और बिरसा मुंडा जैसी छवि के समान तराशने के लिए भारत के आदिवासी समुदाय के बीच बहुत बड़ा विख्यात आदिवासी समुदाय का नेतृत्व करने वाले भगवान बिरसा मुंडा जैसी शख्सियत के समान रूप में दर्शाया गया! 

हमें असल क्रांतिकारी कौन थे यह इतिहास को गहराई से पढ़ने के बाद आंतरिक चिंतन-मनन करने के बाद ही सही क्या था और हमें सही कैसे गलत तरीके से बताया गया तथा गलत क्या था उसे सही कैसे तोड़ मरोड़ कर तर्क वितर्क के साथ फर्क के साथ हमें बताया गया बस यही अंतर है यह जानना बहुत जरूरी है !

!! इतिहास से सिर्फ हमें तीन बातें समझने की जरूरत है !!

(1) :- भारत में आखिर अंग्रेज क्यों और क्या लेने के लिए आये थे!

(2) :- भारत में अंग्रेजों के पहले मुगल आक्रमणकारी भी आये थे दोनों का मकसद एक ही था सोने की चिड़िया भारत को लूटना! 

(3) :- सबसे जरूरी बात यह है कि यह दोनों भारत के कोई मेहमान के रूप में नहीं आये थे!
दोनों का एक ही मकसद था! 

आखिरकार भारत के बाहर से आने वाले दोनों ही आक्रमणकारियों तथा मजहबीयों ने भारत को सिर्फ लूटा ही नहीं लूटने के साथ ही साथ दोनों धर्मावलंबियों ने क्रमशः अपने अपने धर्म कि स्थापना भी की और भारत की प्राचीन परंपराओं तथा धार्मिक आस्थाओं के केंद्र को विध्वंस भरपूर किया तथा अपने अपने धर्मों को स्थापित करते हुए उनके अपने धर्मों को मानने के लिए उन्होंने बड़ी संख्या में भारतीयों का धर्मांतरण किया मुगलों ने तलवार के दम पर और अंग्रेजों ने गरीब समुदायों के परिवारों को आर्थिक प्रलोभन देकर यह खेल खेला!

यह धर्मांतरण का खेल ऐसे ही बरसों से चला आ रहा है इसका विरोध आखिर क्यों नहीं होता है इसके पीछे सिर्फ एक ही कारण है और वह हे अपने क्षेत्र में अपनों का अपनों के बीच घमंडी नेतृत्वकारी स्वभाव और हर कोई समझदार व्यक्ति अपनी स्वयं की छवि चमकाने के लिए समुदायों के बीच राजनयिक प्रतिनिधियों वाली मानसिक प्रतिस्पर्धा जो राजनीतिक दल के माध्यम से अपने क्षेत्र में मुल समस्याओं को छोड़कर उनकी गाईड लाइन का साथ देते फिरते हैं!

ऐसे में आदिवासी समुदाय के बीच धर्मांतरण का विरोध करने वाले अच्छे लोग बहुत कम है!

गर्व की बात है विरोध है तो सही जिन्हें अपने पुरखों के द्वारा मिला नाम व शान और अस्मिता की रक्षा सदियों से बखूबी से करते हुए आ रहे है!

समस्या यह है कि सत्ता प्राप्ति में ऐसी राष्ट्रवादी विचारधारा व विरोधी लोग आदिवासी समुदाय की राजनीतिक सत्ता प्राप्ति में उन्हें बड़ा रोड़ा दिखाई देते हैं!

धर्मांतरण एक सोची समझी साजिश के तहत एक बड़ा खेल है जो राजनीतिक दलों में सत्ता प्राप्ति का पदभार व लालच देने का खेल खेल रही है!

जिस दिन आदिवासी समाज की यह बिमारी हम सभी को समझ में आ जायेगी बाकी यह समस्या कोई बहुत बड़ी चुनौती  
जैसी नही है!
ईसाई मिशनरियों ने उन्हें मोहरा बना के 5 वी अनुसूची छेत्र में आदिवासियों को सेवा के नाम से उनकी प्राचीन रुढ़िवादी परम्पराओं तथा रिती रिवाजों संस्कृति तथा सामाजिक व्यवस्था में धर्मांतरण की सेंधमारी करके उन्हें बर्बाद करने का षड्यंत्र रचा ताकि ईसाई मिशनरिया अपने विदेशी संस्था के माध्यम से फॉरेन फंड के जरिए सेवा के नाम पे धर्म के माध्यम से आदिवासियों का राजनीतिक ध्रुवीकरण कर आदिवासी को बांट सके तथा बड़े बड़े भारतीय व्यापारियों के मदद से आदिवासियों के रिसोर्सेज पे कब्जा कर अपना धंधा चला सके तुम कोयला, बोकसाइड खोदो और हमारा विदेशी मशीन और टेक्नोलॉजी हमसे खरीदो ताकि हमारा तुम्हारा धंधा आराम से चले और सेवा के नाम से ईसाई NGO को फंडिंग भी करो और ईसाई को आदिवासी का मसीहा घोषित करते रहो ताकि ये लोग हमलोगों का मानसिक गुलाम बन जाए और हमारे खिलाफ कुछ बोल भी नहीं पाए! 

मीठा जहर है ये ईसाई मिशनरिया! 

Native American के साथ क्या किया इनलोगों ने सबको पता है इसे कहते हैं अंतरराष्ट्रीय कूटनीति लेकिन हमारे लोग ही दिमाग से पैदल हैं और चमचई और दलाली में कभी कम नहीं रहेंगे! 

इसी लिए आज हमलोगों का ये हाल है! 

भगवान बिरसा मुंडा तो चर्च में तीर मार दिए थे और ईसाई का गुलाम बनने से इंकार कर दिए थे तो कोई आदिवासी पढ़ा लिखा मोहरा तो चाहिए था ना उन्हें! 

जयपाल सिंह मुंडा ईसाई मालिक लोगों का पालतू तोता था जिसे ईसाई मिशनरियों ने पाल पोस के बड़ा किया था ताकि इन्हे बाली का बकरा बना के अपना काम निकाल सकें! 

जैसे अमेरिका ने एक वैज्ञानिक ओसामा बिन लादेन को पैसा ट्रेनिंग और हाथियार दिया रूस से लड़ने के लिए ताकि अफगानिस्तान में अपने शत्रु रूस को अमेरिका भगा के अपना धंधा पानी मतलब व्यापार चला सके! 

जयपाल सिंह मुंडा ..में अगर आदिवासियत इतना ही उफान मार रहा था तो वे अपनी
पत्नी कन्वर्टेड क्रिश्चियन धार्मिक अल्पसंख्यक Tara Wienfried Majumdar से शादी ही नही करता लेकिन ये सब चाल है बाबू! 

भारत लौटने के दूसरे वर्ष के आखिरी दिनों की ही बात है, जब उन्होंने  के साथ दार्जिलिंग में Tara Wienfried Majumdar से ईसाई रीति से विवाह किया! 

नये जोड़े का हनीमून बस्तर स्टेट के जगदलपुर में बीता! 

जगदलपुर में उनके हनीमून की खास व्यवस्था स्टेट के प्रशासक डोनाल्ड रत्नम ने की थी! 

क्यों आदिवासी लड़की नहीं मिली क्या या पढ़ लिख कर कुछ जादा ही हाई क्लास ईसाई बन गए थे?

मुझे पता है की ईसाई मानसिक गुलाम और चमचों को ये बात हजम नही  होगी और आ जायेंगे ज्ञान बाटने!

मैं किसी भी धर्म महज के खिलाफ बिल्कुल नहीं हूँ! मैं खिलाफ हूँ ऐसे षड्यंत्रों के आकाओं से जो मेरे गरीब आदिवासी समाज का शोषण ऐसे सेवा की आड़ में मिशनरी संस्थाओं के द्वारा चंद आर्थिक प्रलोभन के दम पर मतांतर और धर्मांतरण बड़ी संख्या में किए

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