देवारी तिहार क्या है..?💐 देवारी तिहार क्यों मनाया जाता है..?

💐देवारी तिहार क्या है..?💐
  देवारी तिहार क्यों मनाया जाता है..?
देवारी में कुम्हड़ा, जिमी कंद, डांग कंद, कोचई कंद के उपयोग के बारे में विस्तृत आलेख पढ़ें....

   आज हम लोग बाहरी आडम्बर को देखकर उनकी नकल करके परम्परागत देवरी तिहार के नाम से अपना दिवाला निकाल रहे है....हमें ऐसे आडम्बरों से समाज को बचाना होगा..!
देवारी = देव + आरी = देवताओं की आराधना..
नया फसल आने की खुशी में अन्न- धन, घर और गांव के समस्त देवी देवताओं की आराधना का नाम ही देवारी है...

सुरोती की रात में ईशर गवरा की शादी :-- यह गोंडों का पारम्परिक प्रमुख त्यौहार है, इसे कार्तिक माह के अमावश्य पर नया फसल आने की खुशी में ईशर गवरा के शादी के रूप में मनाया जाता हैं..!
      कार्तिक अमावश्य की रात को सुरोती कहते है इस रात को ईसर गौरा की शादी के उत्सव के रूप में मनांते है... ये मान्यता  है कि ईसर गौरा की शादी के बाद से ही गांव में शादी शुरू होती है, यह भी मान्यता है कि सुरोती की रात से ही ठंड शुरूआत होती है, अर्थात ठंड का जन्म सुरोती की रात में होती है..!
        सुरोती के एक सप्ताह या पांच दिन पूर्व गवारा चबूतरा में एकत्रित होकर गवरा जगाते है, और हर रात को बाजे गाजे के साथ गांव की कन्याये मधुर पारम्परिक गीत गाकर ईसर गवरा और गांव की देवी देवता को सुमरते है..!
        सुरोती के दिन गांव के लोग बाजे गाजे के साथ एक निश्चित जगह से कुंवारी मिट्टी लाते है, और रात को उसी मिट्टी से ईशर गवरा का प्रतीक रूप बनाकर बड़े धूम धाम से ईशर गवरा की शादी करते हैं..! 
        कार्तिक अमावश्य सुरोती की शाम को गांव के सभी घर के कोना कोना में दीया जलाया जाता है, *दिए की रौशनी से जगमग- जगमगाते गांव का कोना - कोना मानो ऐसा लगता है मानो प्रकृति साक्षात  देव रूप में विराजे हो...* आज भी हमारे गावों में कम से कम पांच घरों में एक दूसरे के यहां जलते दीये आदान प्रदान किए जाने की परम्परा है..!
              सुरोती की रात को गांव की महिलाएं अपने अपने सिर पर करसा लेकर धूम धाम से बाजे गाजे के साथ घर - घर जाकर करसा (कलश) परघाते है,  इस अवसर पर महिलाये बहुत ही मधुर करसा पराघौनी गीत गाती है और एक जगह एकत्रित होकर ईसर गवरा की बारात में शामिल हो जाती है, गांव के बइगा ईसर गवरा की जयकारा लगाकर गांव का भ्रमण करते हैं और गवरा चबूतरा में सभी करसा को रख देते है...!
           अमावश की अंधेरी रात में महिलाओं के सिर पर झिल मिल जलते हुए कलश का झुंड, बाजा के साथ गाती महिलाओं की मधुर गीतों का स्वर, देवता झुपते बैगा, सिरहा....ये नज़ारा देखते ही बनता है.. ऐसा लगता है मानो ईसर गवरा की बारात में गांव के सभी देवी देवता भी शामिल हो गए हों..!

झिलमिल पानी...सुरोति की आधी रात को सूर्योदय के पहले गांव के प्रत्येक घर की महिलाएं तालाब से नया करसा में पानी भरकर लाती हैं जिसे झिलमिल पानी कहते हैं, सुरोति के दूसरा दिन कोठा में पशुधन की पूजा करने, खिचड़ी खिलाने के समय इसी झिलमिल पानी का उपयोग करते हैं..! 
           दूसरे दिन सुबह बाजे गाजे के साथ ईसर गवरा को तालाब में ठंडा करते है..!
     
 *यूँ तो एक दिया से पूजा की जा सकती है* लेकिन घर के कोने कोने में एक साथ कई दीए जलाए जाते हैं... 
*इसमे कुछ वैज्ञानिक तथ्य भी है~* खेत मे नया फसल पकने के समय फसल को नुकसान पहुंचाने वाले महू, टिड्डे और अन्य कीट पतंग दिन के उजाले में खेत में छिप जाते हैं, और अंधेरी रात को फसल पर हमला कर नुकसान करते हैं, जगमग जलती दीये की रौशनी ये महू, कीट पतंग रात को अंधेरे से उजाले की ओर गांव तरफ आकर्षित होते हैं और जगमग जलते हुए दीए में जलकर मर जाते हैं...इस प्रकार फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीट पतंगों से फसल की सुरक्षा हो जाती है..! इसिलए घर और गांव के कोना कोना में दीये जलाते हैं..!

गोर्धन पूजा अर्थात गो रूपी धन की पूजा~ सुरोती के दूसरे दिन शुक्ल पक्ष के एक्कम को 🐂🐄🐂 गो रूपी धन की पूजा की जाती है, अपने अपने घरों में बरा, सुन्हारी, नया चांवल का भात, कुम्हड़ा, जिमी कांदा, कोचई कांदा, डांग कांदा सभी को मिलाकर खिचड़ी के रूप में  पशुधन को खिलाई जाती है, राउत के द्वारा गायों को सुहाई (माला) पहनाया जाता है..!
*शाम को गोठान में सभी जानवरों 🐂🐃🐄 को एक साथ रेंगाते हैं जिसे गोर्धन खुंदाना कहते है..* गोर्धन खुंदाते वक्त यह ध्यान दिया जाता है कि कौन सा पशुधन , गाय या बैल, भैंस या भैंसा पंडवा या पंडिया, अगला या पिछला, दायां या बांया किस पैर से गोर्धन को खुंदा है..?      
              इससे आने वाला अगले साल में कौन सी फसल अच्छी होगी, और बरसात कैसी रहेगी बुजुर्ग सियान लोग  इसका अनुमान लगा लेते है..!

खिचड़ी में कुम्हड़ा, जिमी कांदा, कोचई कांदा, डांग कांदा का उपायोंग क्यों करते हैं...?
        गोंड और गोंड़वाना का मूल दर्शन किस्से कहानियों और किवदंतियों में नही मिलता, संसार की उत्पत्ति प्रकृति के मातृ शक्ति और पितृ शक्ति के मेल से होती है, गोंडों का सभी परम्पराएं, नेंग- दस्तूर, तीज त्यौहार  इसी मूल शक्तियों के आधार पर निर्धारित है..!   
               आप सभी को मालूम है कि जिस प्रकार धरती को माता और आकाश को पिता मानते हैं, बरसात में आकाश (पिता) से धरती (माता) पर पानी बरसता है, तब धरती माता के गर्भ में नाना प्रकार के जीव जंतु पैदा होते हैं, पेड़ पौधे घास उगते हैं, उसी प्रकार मातृ शक्ति और पितृ शक्ति की मेल से तीसरी शक्ति संतान पैदा होती है..!
             प्राकृतिक शक्तियों को मानने व धारण करने वाला गोंड़  समाज प्रकृति को सर्वोपरि मानकर देवारी में नया चावल के भात के साथ  कुम्हड़ा, जिमी कांदा, कोचई कांदा, डांग कांदा को मिलाकर  खिचड़ी बनाते हैं, अपना पशुधन को खिलाते हैं, और खुद खाते है और दूसरों को भी खिलाते हैं, खिचड़ी को कम से कम पांच घरों में बांटना जरूरी होता है..!
कुम्हड़ा :-- धरती और आकाश के बीच आकाशीय मार्ग (अधर) पर फलने वाला इस धरती का सबसे बड़ा फल होता है, जिसका एक फल का वजन एक क्वींटल से अधिक भी होता है, कुम्हड़ा ज़मीन या छत या  किसी अन्य पेड़ में कभी नही फलता, ये अधर में फलता है जहाँ ज़मीन से सीधा संपर्क न हो... *जैसे~* कुम्हड़ा खपरैल व घास के घर व लकड़ी के मचान में फलता है... *कुम्हड़ा 7 धारी, 5 धारी और 12 धारी वाला गोल फल होता है..... 7 + 5 + 0 =* जो प्रकृति के सात रूप *(सात देव)* सात दिन, सात रात, सात रंग, सात स्वर, सात समंदर,...प्रकृति के प्रतीक माना जाता है और प्रकृति के  *(पांच तत्व शक्ति)*  तथा *(धरती का आकार गोल, पानी की बूंद का आकार गोल, माता के गर्भ का आकार गोल, अंडा आकार गोल होता है..)* कुम्हड़ा फल में ही (7+5+0 = 12) इन सभी का समावेश होता है, इसी के आधार पर कुम्हड़ा का उपयोग किया जाता है..!
जिमी_कांदा :-- जिमी कांदा धरती के गर्भ से मिलने वाला बड़ा कंद होता है, धरती में अन्न का एक दाना डालने पर धरती माता अनेकों दाना देती है, उसी प्रकार जिमी के एक कंद के बदले धरती माता के गर्भ से अनेकों कंद पैदा होता है, जिमी कंद औषधि का काम करता है, बल वर्धक, पाचक, रक्त शोधन का काम करता है, व कृमि नाशक है, इसीलिए खिचड़ी में *प्रकृति के मातृ शक्ति के अंश* के रूप में जिमी कांदा को मिलाते हैं..!
*डांग कांदा :--* जमीन के अंदर पैदा होने वाले को कंद (कांदा) और जमीन के ऊपर फलने वाले को फल कहते हैं, लेकिन डांग कांदा वह कंद है जो जमीन के अंदर नही बल्कि आकाशीय मार्ग यानी जमीन के ऊपर अधर में फलता है, डांग कंद पौष्टिक बलवर्धक, खून बढाने की मुख्य औषधि गुणों से परिपूर्ण भोज्य पदार्थ है, जिसे अक्सर जचकी के बाद महिलाओं को खिलाया जाता है... *डांग कंद को पितृ शक्ति के अंश के रूप में खिचड़ी में मिलाया जाता है. !* (इसे हर पुरुष जानता है ज्यादा समझाने की जरूरत नही है)

कोचई कांदा:-- धरती के गर्भ में पैदा होने वाला औषधि वर्धक, शक्ति वर्धक पाचक होता है, इसका प्रमुख गुण चिकनाहट (Lubricant) जो पाचन में सहायक होता है..! *इस कंद की चिकनाहट के कारण इसे खिचड़ी में मिलाया जाता है..!*

पसेर चावल :- बिना बोये या बिना हल चलाये पैदा होने वाले धान से निकले चावल को पसेर चावल कहते हैं, महिलाएं कमरछठ में इस चावल का उपयोग करती है..!
पहले पसेर चांवल से खिचड़ी बनाये जाने का नेंग था लेकिन पसेर चावल सभी जगह एवं आर्याप्त अनुपात में नही मिलता इसीलिए कोई भी नया चावल का उपयोग खिचड़ी बनाने के लिए की जाती है..!

खिचड़ी का महत्व -
1 :-- खिचड़ी अर्थात अनेकों में एकता का वह मजबूत बंधन का प्रतीक होता है, जिसे कोई अलग नही कर सकता, जिस प्रकार पकी हुई खिचड़ी को एक दूसरे से कोई अलग नही कर सकता. ! *अतः खिचड़ी को समाजिक एकता का प्रतीक मानकर उपयोग किया जाता है..!*

2 :-- जिस प्रकार संसार के संचालन के लिए प्रकृति सभी रूप और सभी शक्तियों का समावेश और सहभागिता जरूरी है....इसी प्रकार प्रकृति के प्रतीक रूप *7* और प्रकृति के मूल तत्व *5* तथा अतः उत्पत्ति का मूल अंडा *0* के प्रतीक रूप में गोंड़ समाज उपयोग करता है,

              उक्त आलेख मैंने आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ में प्रचलित परम्पराओं के आधार लिखा है, जिसे सिर्फ गोंड़ ही नही अपितु अन्य छत्तीसगढ़िया समाज के लोग भी खुशी से मनाते हैं..!
              स्पष्ट कर दूं कि गोंड़वाना भूभाग में हर सौ पचास किलोमीटर की दूरी पर बोली भाषा, रहन सहन, रीति, नीति, परम्पराएं बदलती गई है..
      *आलेख में गोंड़ समाज का जिक्र किया गया है उसे अन्यथा न लें, क्योंकि गोंड़ किसी जाति या धर्म विशेष का नाम नही है, गोंड़ समस्त आदिवासियों एवं गोंड़वाना भूभाग के मानव प्रजातियों का मूल है..!!*

          *🙏जय बूढ़ादेव 🙏*

    .........✍ठाकुर विष्णुदेव सिंह पडोटी
                              राष्ट्रीय प्रवक्ता
            केन्द्रीय गोंड़वाना महासभा धमधागढ़

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