क्या आदिवासी आजाद हैं... ?
क्या आदिवासी आजाद हैं... ?
क्या आजाद भारत में मूलनिवासी आदिवासी आजाद हैं? क्योंकि आज हम देखते हैं कि हमारे दुश्मनों ने मूलनिवसी बहुजन समाज के चार समूहों के 20 करोड़ 85 लाख लोगों को भूखमरी के कगार पर पहुंचा दिया है। उनमें सबसे ज्यादा भूखमरी के शिकार आदिवासी लोग हैं, जो सिधे तौर पर सामूहिक नरसंहार का मामला है।
अगर आजाद भारत भूखमरी में है तो आजाद कैसे है? अगर आजाद है तो भूखमरी में क्यों है? यह सवाल ही इस बात का सबूत है कि हम आजाद नहीं है। और अगर आजाद नहीं है तो आजादी की लड़ाई लड़नी होगी, सफल करनी होगी। सफल करने के लिए यह जानना जरूरी है कि हमारे जो बुद्धिजीवी लोग हैं उनमे ज्यादातर लोगों का ब्रेनवॉश किया गया है। ब्रेनवॉश करने की वजह से वे अपनी बोली नहीं बोलते। जब-जब भी बोलने के लिए अपना मुँह खोलते हैं, लगता है उनके मुँह से कोई ब्राह्मण बोल रहा है।
गांधीजी द्वारा जो आजादी का आन्दोलन चलाया गया था, बाबासाहब डा. अम्बेडकर उसे सभी लोगों के आजादी का आन्दोलन नहीं मानते थे। इसका लिखित दस्तावेज उपलब्ध है।
बाबासाहब 'बहिष्कृत भारत' नामक मराठी पाक्षिक अखबार निकालते थे। इस अखबार के एक सम्पादकीय लेख में बबासाहब लिखते हैं, कि, 'गुलामी में जिनकी हम बातें सहन नहीं करते, आजादी में उनकी लाथें खानी होगी!" यह लिखित सबूत है इसलिए डा. अम्बेडकर गांधीजी द्वारा चलायें गये आजादी के आन्दोलन में शामील नहीं थे। गांधीजी अंग्रेजों के गुलाम थे और हम गांधीजी के गुलाम थे। ब्राह्मण अंग्रेजों के गुलाम थे और हम ब्राह्मणों के गुलाम थे अर्थात हम दोहरे गुलाम (गुलामों के गुलाम) थे। ब्राह्मणवाद ने जो गुलाम पैदा किये थे, उन्हें आजाद करने का कार्यक्रम नहीं था बल्कि ब्राह्मण गांधीजी के माध्यम से अपनी खुद की आजादी का आन्दोलन चला रहे थे, जिसमें ब्राह्मणों ने बैरिस्टर सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे लोगों का इस्तेमाल किया ।
कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव चल रहा था। कांग्रेस वर्किंग कमेटी में सरदार पटेल के समर्थन में 99.99 प्रतिशत बहुमत था मगर गांधीजी ने पटेल के साथ धोखा किया और जवाहरलाल नेहरु को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। सरदार पटेल को पता चला कि जवाहरलाल नेहरु को गांधीजी ने दस-पन्द्रह साल पहले से ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया है।
जब गांधीजी की हत्या का षड़यंत्र रचा गया तो सबसे पहले वह षड़यंत्र सरदार पटेल को मालूम हुआ। उस समय सरदार पटेल को याद आया कि एक समय गांधीजी ने भी मेरे साथ धोखेबाजी की थी। जब सरदार पटेल का मौका आया तब सरदार पटेल ने गांधीजी के बचाव के कोई कदम नहीं उठाया और गांधीजी की हत्या हो गई।
जब गांधीजी की हत्या हुई तब सरदार पटेल केंद्रिय गृहमंत्री थे। गांधीजी की हत्या के बाद जाँच कमीशन बैठा। कमीशन ने सरदार पटेल से स्पष्ट शब्दों में पूछा कि सरदार, हमारे पास जो फाईल उपलब्ध है इससे पता चलता है कि गांधीजी की हत्या की जानकारी आपको पहले ही मिली थी, तब आपने गांधीजी को बचाने के लिए कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? इस सवाल का सरदार पटेल के पास कोई जवांब नहीं था।
क्या सरदार पटेल यह जवाब देते कि गांधीजी ने मेरे साथ धोखेबाजी की इसलिए मैने उन्हें बचाने का प्रयास नहीं किया! उपरोक्त उदाहरण यह साबित करता है कि
गांधीजी का आन्दोलन उच्चवर्णियों के आजादी का आन्दोलन था, उसमें सरदार पटेल का इस्तेमाल किया गया।
गांधीजी द्वारा चलाया गया आंदोलन आदिवासियों की आजादी का आन्दोलन था ऐसा अगर आदिवासी सोंचते हैं तो वे पूर्णतः गलत सोचते हैं। गांधीजी द्वारा चलाया गया आजादी का आन्दोलन आदिवासियों को मुर्ख बनाने के लिए था। गांधी जी ने इस काम के लिए ठक्कर बाप्पा की जिम्मेवारी लगायी ताकि आदिवासियों को आजादी के आन्दोलन में शामील कर आदिवासियों की शक्ति का उपयोग गांधीजी और उनकी बिरादरी को आजाद करने के लिए किया जा सके। जब गांधीजी •आजाद हो जाएंगे तब आदिवासियों को आजाद करने की जरूरत खत्म हो जाएगी। गांधीजी ने आदिवासियों को आजाद करे का काम नहीं किया इसलिए आदिवासी लोग आज भी गुलाम हैं।
जिसे आज हम आजादी कह रहे हैं यह आदिवासियों की आजादी नहीं है। आज विज्ञान भी इस बात के समर्थन में खड़ा है। डी.एन.ए. रिसर्च के आधार पर यह सिद्ध हुआ कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन लोगों का डी.एन.ए. युरेशियन लोगों से मिलता है इसलिए ये लोग भारत के मूलनिवासी नहीं हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि 15 अगस्त 1947 को एक युरोप का विदेशी चला गया तथा दूसरा युरोपीयन विदेशी देश का शासक बन गया। जो युरोप का दूसरा विदेशी शासक बना उसने यह घोषणा की कि भारत आजाद हो गया।
भारत के मूलनिवासी लोग उनके दुष्प्रचार से प्रभावित हो गये और गुलाम होते हुए भी भ्रमवश खूद को आजाद समझने लगे। वैसे तो कई किस्म के रोग होते हैं मगर भ्रम एक खतरनाक मनोवैज्ञानिक बिमारी है। 85% मूलनिवासी बहुजन समाज के लोगों के मन में एक भ्रम पैदा हो गया है कि हम आजाद हो गये हैं। विदेशी आर्य ब्राह्मणों ने एक गंभीर षड़यंत्र के तहत हमारे बीच ऐसा दुष्प्रचार किया। केवल दुष्प्रचार ही नहीं किया बल्कि अंग्रेजों के जाने के बाद सब कुछ उनके हाथ में होने की वजह से उन्होंने मूलनिवासियों के साथ सिर्फ और सिर्फ धोखेबाजी की। वैसे तो समस्त मूलनिवासियों के साथ धोखेबाजी की मगर सबसे ज्यादा धोखेबाजी आदिवासियों के साथ हुई है। यह धोखेबाजी कांग्रेस ने की। आश्चर्यजनक बात यह कि 90 प्रतिशत आदिवासी आज भी कांग्रेस के साथ जुड़े हैं। कांग्रेस के साथ जुड़े होने के कारण आदिवासी धोखेबाजी के शिकार होते रहे। गांधीजी ने आदिवासियों को अपने साथ जोड़ा मगर स्वयं को आदिवासियों से नहीं जोड़ा। आदिवासी गांधीजी से जुड़े हुए थे और गांधीजी ब्राह्मणवाद से जुड़े हुए थे, इस प्रकार आदिवासी ब्राह्मणवाद से जुड़े । ब्राह्मणवाद के साथ जुड़ने से आदिवासियों के साथ सबसे बड़ा धोखा हुआ।
आजादी के 58-59 साल में लगभग 45 से 50 साल तक इस देश में कांग्रेस पार्टी की सरकार रही है। कांग्रेस को केंद्र में पहुंचाने में आदिवासियों की बहुत बड़ी भूमिका रही है। कांग्रेस की केंद्र में सरकार बनते ही आदिवासियों का पक्का बंदोबस्त कर दिया गया। आदिवासियों के जो संवैधानिक अधिकार हैं उसे देने की बात तो बहुत दूर रही, संविधान में लिखी हुई बातें आदिवासियों को मालूम ही नहीं होनी चाहिए इसकी भी उन्होंने व्यवस्था कर दी।
अनपढ़ - गवारों की बात छोड़ो, जो पढ़े लिखे आदिवासी लोग हैं उनसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या आपने भारत का संविधान देखा? तो पढ़े-लिखे लोग बोल सकते हैं कि देखा तो नहीं मगर सुना जरूर है। जिन्हें आदिवासियों ने केंद्र में पहुंचाया उन्होंने आदिवासियों को जानकारी तक नहीं होने दी तो क्या आदिवासियों को वास्तव में कुछ देना चाहते हैं? शासक जाति के लोग कुछ भी देना नहीं चाहते। वे
कुछ भी न देने के बावजूद भी हम संतुष्ट रहते हैं। क्यों रहते हैं? क्योंकि हम लोगों को मालूम ही नहीं है कि हमारा क्या है और क्या नहीं है।
संविधान में हक अधिकार की सारी बातें लिखी हुई है मगर आदिवासियों को • पता नहीं है। पिछले पचास वर्षो में आदिवासियों का विस्थापन हो गया। उनके पास पेट भरने का कोई साधन नहीं है इसलिए मेहनत-मजदूरी करने के लिए वे दर-दर भटक रहे हैं। जो आदमी अपने क्षेत्र से विस्थापित हो जाता है उसके बच्चे स्कूलों में कैसे जा सकते हैं? क्योंकि सभ्यताओं का विकास एक जगह स्थायी रहकर होता है। पिछले पचास सालों में आदिवासियों के कल्याण और विकास के लिए कोई काम नहीं हुआ। सौ रुपये के बजेट में 99 रुपये प्रशासन पर खर्च किया जाता है और केवल एक रुपया विकास पर खर्च होता है। जब समीक्षा ही नहीं है तो आदिवासियों का विकास कहां से होगा ? सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक विकास का कोई कार्यक्रम लागू नहीं किया गया।
वनवासी कल्याण आश्रम के नाम पर कल्याण केंद्र खोले गये तथा इसके माध्यम से आदिवासियों के धार्मिक ध्रुवीकरण का कार्यक्रम चलाया गया। इस तरह से हम देखते हैं कि आदिवासी आग से निकल गये और फफूंद में पहुँच गये। आग में जलन ज्यादा होती है इसलिए फफूंद में चले गये मगर वहां भी आग ही है।
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