अपना फ़ैसला, अपने हाथ
अपना फ़ैसला, अपने हाथ| आदिवासी समाज को आरक्षण समस्या पर ऑप्शन चुनने का मौका!!!
लाखों आदिवासियों के जीवन को प्रभावित करने वाले 32% एसटी आरक्षण पर हमले के मुद्दे पर आप क्या ऑप्शन चुनेंगे?
1. डीओपीटी, भारत शासन के 05.07.2005 के पत्रानुसार ओबीसी का आरक्षण घटा कर 6% किया जाए|
2. एस.सी.-एस.टी. दोनों से चार प्रतिशत घटा कर ओबीसी को दे दिया जाए; एस.सी.-एस.टी.-ओबीसी का 8-28-14 कुल मिलाकर 50%.
3. 50% की सीमा के भीतर लाभार्थी वर्गों के आपसी तुलनात्मक हिसाब से एस.सी.-एस.टी.-ओबीसी का 6.5-16-27 प्रतिशत आरक्षण कर दिया जाए|
4. छत्तीसगढ शासन से सुर मिला कर 58% को बचाने की ही कोशिश की जाए; आरक्षण संशोधन अधिनियम 2011 अपास्त हुआ तो 16 मार्च 2012 की स्थिति में वापस एस.सी.-एस.टी.-ओबीसी का प्रथम-द्वितीय श्रेणी 15-18-14 और तृतीय-चतुर्थ श्रेणी में 16-20-14 प्रतिशत आरक्षण रह जाएगा|
आदिवासी समाज के जागरूक कर्मचारियों, शिक्षिका उपासना ध्रुव और डॉ. चंद्रपाल भगत द्वारा दाखिल किए हुए साझा हस्तक्षेप आवेदन के माध्यम से WPC 591/12 प्रकरण में आदिवासी समाज के चुने हुए ऑप्शन को मा. हाई कोर्ट बिलासपुर के समक्ष रखा जाएगा| याद रहे जब सारे सामाजिक प्रतिनिधि और संगठन नींद में डूबे थे या मौन व्रत पर थे तो हम ने ही खुद पर दलालों के हमले सह कर आदिवासी समाज को सबसे पहले इस खतरे से आगाह किया था|याद करिए जब 20 जून को पहली बार हमने दस्तावेजों के साथ सतनामी समाज संगठनों पर हमला बोला था तो हमारे ही आदिवासी संगठन/प्रतिनिधि बहानेबाजी कर रहे थे| सवा नौ साल से गूंगे पड़े आदिवासी समाज को हमने ही आवाज और ताकत दी, मंत्रियों शिव डहरिया और रूद्र कुमार के कान खोल दिए| आज जब सतनामी समाज संगठन हम पर हमला कर के थक पड़े, और आपस में मुकद्दमे वापस लेने की बात शुरु हुई है तो हरामखोर अ.ज.जा. शा. सेवक संघ, प्रगतिशील कुड़ुख समाज, प्रमोटी आईएएस गैंग सब सामने आ गए| डॉ. के.एस. चौहान जैसे बिलासपुर हाई कोर्ट में पिटे हुए वकील को प्रमुख संगठन द्वारा आदिवासी समाज का पक्ष रखने लाया गया तो वह सोशल जस्टिस लीगल सेल के कार्यक्रम में सतनामियों की क्लास ले रहे हैं| हाई कोर्ट में इनकी लचर इंटरवेंशन अप्लीकेशन देखिए और समझिए कि अगर आज भी आपने आदिवासी समाज के जानकार लड़ाकों का साथ नहीं दिया तो नतीजा क्या होगा? आने वाली पीढियां आपके नाम पर थूकेंगी कि हाई कोर्ट में इतना बड़ा मुकद्दमा था, खतरे की पूरी चेतावनी थी, फिर भी आरक्षण के लाभार्थी नालायकों की नींद सो रहे थे|
हाई कोर्ट को छग. आरक्षण संशोधन अधिनियम 2011 की वैधता पर फ़ैसला करना है| यह फ़ैसला सोमवार 18 अक्टूबर को आए या अगली किसी तारीख में| एस.सी.-एस.टी.-ओबीसी का 15-18-14 (प्रथम-द्वितीय श्रेणी पद) या 12-32-14 (तृतीय-चतुर्थ श्रेणी पद) कुल मिलाकर 58% आरक्षण बचना लगभग असंभव है| एक बात तय है कि इसका कोई राजनीतिक हल फ़िलहाल नहीं दिख रहा|आदिवासी हित में सुप्रीम कोर्ट से भी किसी राहत या सफ़ाई की बहुत आशा नहीं की जा सकती| याद रहे कि दो सतनामी समाज संगठनों- उनके कुछ व्यक्तियों और ओबीसी समाज के डॉ. राजेश बघेल- श्री राम बघेल द्वारा राज्य बनने के बाद पहली बार आदिवासियों को उनका हक दिए जाने को चुनौती दी गई है| बाद में जनरल वर्ग के कुछ व्यक्ति/संगठन भी इस हमले में शामिल हो गए हैं| आदिवासियों के सामाजिक दलाल इस मुद्दे पर कोई भी खुली चर्चा करने से मुंह चुरा रहे हैं|
आपकी आवाज भी हम ही बुलंदी से मा. हाई कोर्ट के सामने रखेंगे|सोचिए जिस योगेश ठाकुर ने आदिवासी कर्मचारियों के हित के लिए हाई कोर्ट के लिए रिटन सबमिशन सुप्रीम कोर्ट के कानूनी जानकारों से “वेट्टिंग” करवाए, उसी को आर्थिक सहयोग बाधित करना समाज के हित में था? रिटायर्ड हाई कोर्ट चीफ़ जस्टिस को आदिवासियों का पक्ष रखने के लिए लाने पर उचित राशि खर्च करने का हमारा प्रस्ताव बेहतर था या अ.ज.जा. शा. सेवक संघ के पदाधिकारियों द्वारा चंदे के पैसे पर राजधानी पर्यटन का व्यवहार? अब यह आपका विवेक है कि आप सच्चे आदिवासी लड़ाकों का साथ देंगे या दलित सोच के जातिवादी दलालों का!
निवेदक: योगेश ठाकुर, अध्यक्ष- आदिवासी छात्र संगठन.
मोबाईल+ ग़ूगल पे- 9617154696
बैंक खाता- 60392245606, IFSC Code- MAHB0001477.
छत्तीसगढ आदिवासी छात्र कल्याण संघ महासमुंद.
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