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32% ST आरक्षण  को चुनौती के हाई कोर्ट केस का डेट फिर टला  अब 18 अक्टूबर को आ सकता है फैसला. आदिवासी समाज खुद तय करे क्या ऑप्शन लेना है कोर्ट में. राज्य शासन और अ ज जा सेवक संघ के दलालों पे भरोसा महंगा पड़ सकता है. पढ़ो,समझो, चुनो सही.

आदिवासी समाज को आरक्षण समस्या पर ऑप्शन चुनने का मौका!!!

हाई कोर्ट को आरक्षण संशोधन अधिनियम 2011 की वैधता पर फ़ैसला करना है| यह फ़ैसला सोमवार 6 सितंबर को आए या अगली किसी तारीख में| एस.सी.-एस.टी.-ओबीसी का 12-32-14 कुल मिलाकर 58% आरक्षण बचना लगभग असंभव है| एक बात तय है कि इसका कोई राजनीतिक हल फ़िलहाल नहीं दिख रहा| आदिवासी हित में सुप्रीम कोर्ट से भी किसी राहत या सफ़ाई की बहुत आशा नहीं की जा सकती| याद रहे कि दो सतनामी समाज संगठनों- उनके कुछ व्यक्तियों और ओबीसी समाज के डॉ. राजेश बघेल- श्री राम बघेल द्वारा राज्य बनने के बाद पहली बार आदिवासियों को उनका हक दिए जाने को चुनौती दी गई है| बाद में जनरल वर्ग के कुछ व्यक्ति/संगठन भी इस हमले में शामिल हो गए हैं| आदिवासियों के सामाजिक दलाल इस मुद्दे पर कोई भी खुली चर्चा करने से मुंह चुरा रहे हैं| लाखों आदिवासियों के जीवन को प्रभावित करने वाले इस मुद्दे पर आप क्या ऑप्शन चुनेंगे?

1. डीओपीटी, भारत शासन के 05.07.2005 के पत्रानुसार ओबीसी का आरक्षण घटा कर 6% किया जाए|
2. एस.सी.-एस.टी. दोनों से चार प्रतिशत घटा कर ओबीसी को दे दिया जाए; एस.सी.-एस.टी.-ओबीसी का 8-28-14 कुल मिलाकर 50%.
3. छत्तीसगढ शासन से सुर मिला कर 58% को बचाने की ही कोशिश की जाए; संशोधन अधिनियम अपास्त हुआ तो 16 मार्च 2012 की स्थिति में वापस एस.सी.-एस.टी.-ओबीसी का प्रथम-द्वितीय श्रेणी 15-18-14 और तृतीय-चतुर्थ श्रेणी में 16-18-14 प्रतिशत आरक्षण रह जाएगा|

आदिवासी समाज के जागरूक कर्मचारियों, शिक्षिका उपासना ध्रुव और डॉ. चंद्रपाल भगत द्वारा दाखिल किए हुए साझा हस्तक्षेप आवेदन के माध्यम से WPC 591/12 प्रकरण में आदिवासी समाज के चुने हुए ऑप्शन को मा. हाई कोर्ट बिलासपुर के समक्ष रखा जाएगा| याद रहे जब सारे सामाजिक प्रतिनिधि और संगठन नींद में डूबे थे या मौन व्रत पर थे तो हम ने ही खुद पर दलालों के हमले सह कर आदिवासी समाज को सबसे पहले इस खतरे से आगाह किया था| आपकी आवाज भी हम ही बुलंदी से मा. हाई कोर्ट के सामने रखेंगे| अब यह आपका विवेक है कि आप सच्चे आदिवासी लड़ाकों का साथ देंगे या दलित सोच के जातिवादी दलालों का!

निवेदक: योगेश ठाकुर, अध्यक्ष- आदिवासी छात्र संगठन.

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