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32% एस.टी. आरक्षण पर संकट का विवाद
क्या मामला है?
छत्तीसगढ (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण अधिनियम) (1994 का क्र. 21) में संशोधन अधिनियम 2011 के प्रकरण में 14 जून को हाई कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि सभी अधिवक्ता 12 जुलाई के सप्ताह में आखिरी जिरह करें| सतनामी संगठनों ने इसको हाई कोर्ट बिलासपुर में चुनौती दे रखी है (गुरु घासीदास साहित्य एवं सांस्कृतिक संस्थान, रायपुर बनाम छग. राज्य, WP-C. 591/2012)| सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ के 5 मई के मराठा आरक्षण फ़ैसले के बाद छत्तीसगढ के संशोधन अधिनियम 2011 का निरस्त होना तय माना जा रहा है| पिछली सुनवाई तारीख का आदेश और जीएडी का जो डॉकुमेंट शेयर किया गया है उसमें विवरण देखिए| आधिकारिक वेबसाईट पर भी देख सकते हैं|
इस प्रकरण के पीछे की कथा: छत्तीसगढ राज्य बनने के बाद भी आदिवासियों को नौकरी में आरक्षण का पूरा हक नहीं मिला| मध्य प्रदेश की आरक्षण व्यवस्था ही जारी रखी गई| 2003 से प्रमोशन में 23% एस.टी. आरक्षण का प्रावधान हुआ लेकिन 2012 तक भर्ती में सिर्फ़ 18 या 20% ही आरक्षण मिलता रहा| आरक्षण अधिनियम 1994 में 2011 के विधानसभा संशोधन के बाद शासन ने 16 मार्च 2012 से इसे प्रभावी किया और नियम-परिवर्तन कर 32% एस.टी. आरक्षण का रोस्टर जारी किया| चुनौती दिए जाने पर भी हाई कोर्ट ने स्टे ऑर्डर नहीं दिया लेकिन साफ़ कर दिया कि इस नीति के आधार पर हुई सभी भर्तियां प्रकरण के आखिरी फ़ैसले पर निर्भर होगी|
राज्य बनने के पहले ग्यारह साल 12.6% जनसंख्या के बावजूद एस.सी. 16% आरक्षण का फ़ायदा ले रहे थे| 0.6% के अंतर को पाटने के लिए शासन से चर्चा के बजाए उन्होने एस.टी. को इतनी देर से मिली 12% बढोतरी पर खतरे की तलवार लटका दी| आश्चर्य यह है कि सतनामी याचिकाकर्ताओं ने एस.सी. के प्रतिनिधित्व के आंकड़ों पर विवाद खड़ा किया, साथ ही अनुच्छेद 16(4) के तहत कुल आरक्षण 50% के सीमा-पार होने का भी तर्क दिया| ध्यान रहे कि एस.सी. -एस.टी.- ओबीसी का 12+32+14% मिलाकर कुल आरक्षण 58% हो गया है|
फ़ायदे-नुकसान के हिसाब से कौन कहां खड़ा है इस प्रकरण में?
संशोधन अधिनियम 2011 के निरस्त होने पर ऑटोमैटिकली पिछली स्थिति 16 मार्च 2012 यथा-प्रभावी हो जाएगी| तब एस.सी. -एस.टी.- ओबीसी आरक्षण, प्रथम-द्वितीय श्रेणी पदों के लिए 15-18-14 प्रतिशत और तृतीय-चतुर्थ श्रेणी पदों के लिए 16-20-14 प्रतिशत पहुंच सकता है|
सतनामी यही चाहते हैं; पहले अपना फ़ायदा फ़िर एस.टी.-ओबीसी की चिंता| छग. शासन की स्थिति यह है कि ‘एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए’| अनारक्षित वर्ग के लोग इस प्रकरण में हस्तक्षेप करने आ गए हैं क्योंकि आरक्षण के कम/स्थगित होने में उनका फ़ायदा है| उनके अधिवक्ता हाई कोर्ट से यह याचना करने से चूकेंगे नहीं कि 2012 से अब तक की अतिशेष आरक्षित भर्तियां रद्द की जाएं| एस.सी. वर्ग को जनसंख्या से अधिक आरक्षण न मिले यह भी मांग की जा सकती है| छत्तीसगढ के ओबीसी समाज और आदिवासी समाज ने अब तक इस प्रकरण में अपनी उपस्थिति नहीं दिखाई है जबकि इनमें से ही किसी एक या दोनों के हित बाधित हो रहे हैं|
छग. शासन प्रतिनिधित्व के नए-ताजा आंकड़े लगातार जुटाने के लिए एक तंत्र विकसित कर सकता है| लेकिन प्रमोशन-रिजर्वेशन के अदालती पचड़े में दोनों प्रमुख दलों की सरकारें 2003 से अब तक यह काम नहीं कर पाई हैं| छोटेलाल पटेल आयोग को अब तक दफ़्तर-लिपिक तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं| पिंगुआ समिति के गठन का एक साल जुलाई में पूरा हो जाएगा लेकिन उसके उद्देश्य और समय-सीमा तक निर्धारित नहीं की गई है| सबसे भारी समस्या होगी अधिनियम/अध्यादेश लाने के लिए आरक्षित प्रवर्गों को 50% के भीतर आरक्षण-हिस्सेदारी साधने पर सहमति बनाना| यह जल्दी या आसानी से होने वाला काम नहीं है जैसा कि प्रमोशन-रिजर्वेशन के सवा दो साल के दुखद अनुभव ने दिखा दिया है|
आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों और सामाजिक-कर्मचारी संगठनों की क्या तैयारी है?
आदिवासी मंत्री-विधायक साफ़ तौर पर हाथ खड़ा कर चुके हैं कि वे मुख्यमंत्री के सामने समाज-हित में आवाज बुलंद नहीं करेंगे| सर्व आदिवासी समाज के एक गुट के अध्यक्ष बीपीएस नेताम अभी मंडल/आयोग के जुगाड़ में लगे हैं इसलिए मुंह नहीं खोल सकते, न ही उनके पास जन-समर्थन है| दूसरे गुट के अध्यक्ष सोहन पोटाई का बयान है कि छग. शासन 32% एस.टी. आरक्षण किसी तरह जरुर बचा लेगा इसलिए कोई खतरा नहीं है| भारत के अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल के सहयोग के बावजूद महाराष्ट्र 50% से उपर का आरक्षण बचा नहीं पाया इसकी उनको परवाह नहीं है| अ.ज.जा. शा. सेवक विकास संघ के अध्यक्ष आर.एन.ध्रुव ने 13 जून की गूगल मीट में एम. आर. ध्रुव को मौका दिया कि इस प्रचंड खतरे से समाज को आगाह किया जाए| लेकिन फ़िलहाल इस संगठन में हस्तक्षेप याचिका लगाने और इसके लिए बड़े कानूनी जानकार की सेवाएं लेने पर कोई सहमति नहीं है| बड़बोले पूर्व प्रशासनिक अधिकारी, चापलूस पदाधिकारी, रिटायर्ड जिला जज या जिला स्तर के वकीलों पर निर्भर रहने की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है क्यूंकि इनको ढंग से अंग्रेजी लिखना-बोलना नहीं आता और हमेशा खुली बहस से मुंह चुराते हैं?
क्या उपाय है?
सतनामी समाज से सभी मुकद्दमे तत्काल वापस लेने की मांग कर सकने की हिम्मत अभी आदिवासी समाज के संगठनों में नहीं है|
हस्तक्षेप याचिका ही उपाय है बड़े खतरे को टालने की कोशिश की दिशा में| जनजाति वर्ग की ओर से जो भी कानूनी सलाहकार जिम्मेदारी लेगा उसको वरिष्ठ अधिवक्ताओं से भिड़ते हुए सिर्फ़ पांच-दस मिनट में सिविरेबिलिटी डॉक्ट्रिन के प्रयोग पर पर हाई कोर्ट को राजी करना होगा| सुप्रीम कोर्ट में प्रूवेन परफ़ारमेंस देने वाले आदिवासी-हितैषी, कांस्टीट्यूशन-कंसल्टेंट की मदद लेनी होगी| हाथ मिला कर तेजी से काम करना होगा, संसाधन जुटाने होंगे|
योगेश कुमार ठाकुर, अध्यक्ष- छग. आदिवासी छात्र संगठन. मो.+ गूगल पे- 9 6 1 7 1 5 4 6 9 6
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